श्री श्री १००८ श्री रणछोड़दास जी महाराज

विष्णु स्वामी पदाम्भोज भ्रमरायितमानसम। श्री रणछोड़दासं तं नमामि प्रथमं गुरुम।।

सतुआ बाबा आश्रम : एक परिचय

आश्रम के संस्थापक

'रसो वै सः' रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ॥ 'रसोऽहमप्सु कौन्तेय' ( श्रीमद्भगवतगीता दशम अध्याय )

इसी परमात्म रस के आस्वादन में तत्पर आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व सौराष्ट्र के पालिताणा राज्य में रतनपुर नामक ग्राम के कृषक परिवार में एक ऐश्वर्यमय शिशु का प्रादुर्भाव हुआ । बालक जेठा पटेल नाम पाकर बड़ा होकर कृषि कर्म तथा गांव का नेतृत्व करने लगे। एक बार राज्य में घोर अकाल पड़ा । पालीताणा के महाराजा श्रीमान् सूरसिंह राज्य कर वसूलने स्वयं गाँव में शिविर लगा दिये थे । पटेल को बुलाकर कर वसूलने का आदेश दे दिया। इस पर जेठा पटेल ने आपत्ति की, कि अकाल से लोग पीड़ित हैं अतः राज्यकर वसूलना सम्भव नहीं है। राजाज्ञा उल्लंघन करने के अपराध में पटेल को राज्य से निर्वासित कर दिया । ' येषां क्वापि गतिर्नास्ति तेषां वाराणसी गतिः' को मन में संकल्पित कर पटेल राज्य को छोड़ दिये। अपने भरे-पूरे परिवार को बिना सूचना दिये ही पालीताणा राजा सूरसिंह से यह कहकर कि 'एक दिन आपको भी मेरी शरण में आना ही पड़ेगा, इस अन्याय का प्रायश्चित्त करना होगा।' हाथ में बैलों की हाँकने वाली एक छड़ी को लेकर घर से निकल पड़े। जो आज भी आश्रय में विद्यमान है।
कुछ दिनों पश्चात् मिथिला जनकपुर के निकट 'चूँटा' नामक ग्राम में विष्णुस्वामी सम्प्रदाय आश्रम के श्री महन्त नरहरि दास जी ने बड़ी संख्या में अपनी शिष्य मण्डली के साथ काशी में गंगा के पार शिविर लगाया। जेठा पटेल भी दर्शनार्थी के रूप में महात्माओं के दर्शन के लिए गंगा के उस पार गये । तथा उनके पास रहकर शारीरिक श्रम एवं सन्तों की सेवा की । अन्त में श्री महन्त नरहरिदास जी से विधिवत् मन्त्र दीक्षा लेकर जेठा पटेल, बाद में रणछोड़दास कहलाये । सन्तों के आशीर्वाद-अखण्ड साधना और तपश्चर्या से सन्त रणछोड़दास जी ने अनेक अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त की, उस समय काशी का कालखण्ड अलौकिक चमत्कार और ख्याति प्राप्त सिद्धों का था।

महाराज

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